Tuesday, May 21, 2019

राहुल गांधी या नरेंद्र मोदी, जोड़-तोड़ किसके लिए आसान?-नज़रिया

भले ही एक्ज़िट पोल के नतीजों में एनडीए को बहुमत मिलता नज़र आ रहा है लेकिन ये अगर नतीजों में ना बदले तो..

सियासी दलों ने चाहे वे बड़े हों या छोटे, किसी एक गठबंधन को स्पष्ट बहुमत न मिलने की स्थिति में क्या करना है, इसकी न सिर्फ़ रणनीति बनाने में लगे हैं बल्कि लेन-देन मोलभाव की संभावनाएं सक्रियता से तलाश कर रहे हैं.

मोदी-शाह और राहुल नतीजे आने के बाद ही जोड़ तोड़ में सक्रिय होंगे, ऐसा मानना नासमझी होगी.

ऐसा नहीं है कि चंद्रबाबू नायडू और के चंद्रशेखर राव जैसे नेता ही सक्रिय हैं, यूपीए की प्रमुख सोनिया गांधी के नाम से ही मिलने-जुलने के न्यौते बंटने लगे हैं.

चंद्रबाबू काफी हद तक कांग्रेस और राहुल गांधी के पक्ष में जोड-तोड़, समीकरण, शासन और सरकार का एजेंडा बनाने की कोशिश कर रहे हैं तो तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर साहब अपने लिए अहम भूमिका तलाश रहे हैं. उनको कई जगह से दो टूक जवाब भी मिला है.

कहा तो ये भी जा रहा था कि कांग्रेस ने वाईएसआर कांग्रेस के नेता जगन मोहन रेड्डी से भी सम्पर्क किया जो उस समय विदेश थे.

इन कोशिशों को देखते हुए माना जाने लगा था कि अगली संसद में किसी गठबंधन को साफ़ बहुमत न मिलने की संभावना को भांपकर ये कोशिशें हो रही हैं.

चुनाव में सीधी भागीदारी और जनता की नब्ज़ को बेहतर जानने वाले जब इस तरह का प्रयास करें तो पत्रकार चौंकन्ने हो ही जाते हैं.

जब सोनिया गांधी के नाम से न्योता बंटने और तारीख की अदल-बदल की खबर आई तो इसे त्रिशंकु संसद बनने और आगे की तैयारियों का संकेत ही समझा गया.

देने को तो इस तरह के सिग्नल नरेंद्र मोदी ने भी दिए, पर एक नेता, मजबूत नेता और पाकिस्तान को धूल चटाकर दिग्विजय पर निकले नेता की भी कुछ मजबूरियाँ थीं और हैं.

जब पूरा चुनाव उनके नाम पर लडा गया हो, उसे भी अपने पक्ष और विपक्ष के बंटवारे में मजा आ रहा हो तो वे किस तरह पोस्ट-पोल एलायंस और जुगाड़ की तरफ जा सकते हैं.

लेकिन जब उनको भी लगा कि चुनाव किस लाइन पर है और यूपी-बिहार का नुकसान शायद बंगाल-ओडिशा की बढ़त से पाटा नहीं जा सकेगा तो उन्होंने कभी एनडीए का हिस्सा रह चुकीं ममता बनर्जी की तरफ़ से कुर्ता और रसोगुल्ला भेजने की बात सार्वजनिक की.

बीजू जनता दल के ख़िलाफ़ आक्रमण को धीमा किया, तूफान राहत के नाम पर नवीन पटनायक के साथ खूब तस्वीरें साझा कीं और जब ममता ने उल्टा सिग्नल देना शुरू किया तो आक्रमण तेज कर दिया.

इस बीच उन्होंने अपने नामांकन के समय एनडीए नेताओं की परेड भी कराई और प्रकाश सिंह बादल के सार्वजनिक तौर पर पैर भी छुए.

नरेंद्र मोदी, एनडीए, भाजपा और उनके लगभग सारे ही उम्मीदवारों को नरेंद्र मोदी की मजबूत नेता वाली छवि से लाभ हुआ.

उनसे नाराज शिव सेना भी इसी बात का लाभ लेने के लिए वापस गठबंधन में आई लेकिन अपनी पसंद का सौदा पटाने के बाद.

मोलभाव करके अपने हिस्से में ज़्यादा सीटें लेने के बाद, खुद को पीएम मैटेरियल मानने वाले नीतीश कुमार भी सिर झुकाकर चुनाव में साथ ही रहे लेकिन छठे चरण के करीब आते-आते बिहार को स्पेशल स्टेटस दिलाने की मांग उठाने लगे, जिसकी वजह से लोग पूछने लगे कि क्या वे फिर पलटने वाले हैं?

किसी भी सधे हुए नेता की तरह, नीतीश भी मोल-भाव का कोई मौका नहीं चूकेंगे.

अभी चुनाव खत्म भी नहीं हुआ और नतीजे आए भी नहीं कि मोदी की मज़बूत नेता, दबंग नेता की छवि से दिक्कत होने लगी है, अगर वे उतने मज़बूत साबित नहीं हुए जितने बताए जाते हैं तो पार्टी के अंदर और बाहर, दोनों तरफ़ से उन पर सवाल उठेंगे क्योंकि पूरा चुनाव उन्होंने अपने नाम पर लड़ने का जोखिम उठाया है.

यह तो नतीजे आने पर ही पता चलेगा लेकिन अगर वे अकेले अपने दम पर बहुमत ले आए तो एनडीए के घटक दलों की 2014-19 की तुलना में और भी दयनीय दशा होगी.

हालांकि ये भी कहना चाहिए कि घटक दलों की तमाम शिकायतों के बावजूद मोदी-शाह एनडीए को बनाए रखने में मोटे तौर पर कामयाब रहे.

तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) को छोड़कर गठबंधन मोटे तौर पर 2014 जैसा ही है, जेडीयू और शिवसेना को रियायत देकर मना लिया गया, यहां तक कि अलग हो गए असम गण परिषद को भी दोबारा जोड़ा गया.

ये सभी सीट बँटवारे में रियायत और भविष्य की संभावनाओं के मद्देनज़र साथ आए हैं लेकिन नतीजे आने के बाद मोलभाव में कसर नहीं छोड़ेंगे.

इसकी तुलना में ढीली-ढाली छवि के राहुल को काफी सुविधा होगी और गठजोड़ बनाने के सूत्रधार गुलाम नबी आज़ाद ने तो ये भी कह दिया है कि गठबंधन की सरकार बनाने के लिए प्रधानमंत्री पद का दावा भी छोड़ा जा सकता है. पहले यह बात गुपचुप भी की गई होगी.

ज़ाहिर तौर पर भाजपा और नरेंद्र मोदी की तरफ से एकदम मजबूरी न हो जाए ऐसी घोषणा की ही नहीं जा सकती.

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और दावे को भाजपा नीचे कर ले यह मुमकिन नहीं लगता है. ऐसे करने से तो उसका सारा चुनावी ही नहीं, राजनीतिक कथानक ही धूल-धूसरित हो जाएगा.

Tuesday, May 14, 2019

中美贸易战:美股急挫 特朗普称6月底大阪会习近平

中美贸易战暂无偃旗息鼓的迹象,中国宣布加征关税回击后,美国市场表现焦虑。在周一(13日),美股三大指数急挫超过2%,是华尔街近四个月来表现最差的一日。然而,美国总统特朗普在当日表示,对中国的关税报复并不担忧,美国从关税中获益“数百亿美元”。

“我很喜欢我们现在的状况,”特朗普在白宫对记者说,“我认为现状对我们来说十分有利。”

特朗普还宣布,他与中国国家主席习近平将在6月底在日本大阪举行的二十国集团(G20)峰会中会面。两国元首的上次会面是在去年12月1日,亦是在G20峰会场合。

中国国务院关税税则委员会办公室13日宣布,对价值600亿美元的5000种美国商品,分别加征5%到25%的关税。

特朗普则称, 他会向受影响的美国农民提供价值150亿美元的补贴。

周一开市之后,美股指数应声下跌,与中国制造业及市场联系紧密的科技公司尤其受挫,苹果与特斯拉跌幅都超过5%。

美中两国的关税角力仍在持续,美国除了调高现有对华关税,还在准备向其他总值约3000亿美元的中国商品新征关税。美国贸易代表办公室将公众意见征集的截止日设为6月17日,意味着这批新关税的实施还存在变数发。

在美方上调关税后,中方以加征关税的方式作出强势回应,同时在官媒上作出言辞严厉的表态。中央电视台在北京时间周一晚上7时《新闻联播》栏目中播报,中国已做好全面应对贸易战的准备。

中国官媒此前常使用“中美贸易摩擦”的字眼,“贸易战”一词也时有出现,但在黄金时间播出的《新闻联播》中发表长达一分半钟的评论,以强硬的语气明确表明中国“不愿打,不怕打,必要的时候不得不打,”实属罕见。

北京政府在国内官媒上强势发声,但在关税上调的决定中留有一定的谈判空间。中国的关税直到6月1日才会正式生效,这给两国留下了大约三周的谈判窗口。

值得一提的是,美国对华关税虽在5月11日(上周五)就已生效,但已在运输途中的商品得到豁免。通常来说,中国货物海运至美国的平均运输时间正是三周,换句话说,美国关税将在三周之后,才会真正对大部分中国出口商品造成打击。

从这个角度看,中方关税回击正好匹配了美方的谈判窗口,显示双方都有意愿继续谈判。据悉,双方将重回北京进行新一轮会谈,但毫无疑问的是,关税将如一朵乌云,高悬在谈判桌之上。

如果如特朗普所言,习特会将在下月于大阪再度上演,这次会面是像上回的布宜诺斯艾利斯会谈般成为贸易停战的契机、还是跟第二次的“特金会”一样空手而归,外界拭目以待。根据以往的经验,北京将会希望在元首会面之前解决关键分歧,确保不会无功而返;而华府手上,则握有针对剩余3000亿中国商品的关税作为谈判筹码。

Thursday, May 9, 2019

中美贸易战在即 金正恩动作频频的缘由

正当中美贸易大战、美伊军事对立一触即发之际,朝鲜半岛上金正恩也动作频频,开始发射短程导弹和不明飞行器。

美国有专家警告说,特朗普在对中国挥舞关税大棒之际,他的对朝鲜政策可能被炸成碎片。

2019年5月,韩国军方称,朝鲜在试射几枚短程导弹不到一周后,又发射了不明飞行物。

这一动作正值美国国务院对朝政策特别代表斯蒂芬·比根访问韩国,讨论如何打破美朝核谈判僵局。

韩联社援引韩国参谋长联席会议称,这是朝鲜继5月初发射240毫米和300毫米口径火箭炮、新型战术制导武器后,时隔5天再次发射飞行器。

韩国军方称,这些飞行物是从朝鲜首都平壤以北的新五里地区向东部发射的

目前美韩军方正在对飞行器进行精密分析。朝鲜新五里一带设有"芦洞"导弹基地。有观点推测,从新五里向东发射的飞行器或贯通朝鲜内陆,该武器很可能为导弹。

2019年2月,美国总统特朗普在与朝鲜领导人金正恩在越南的峰会没有达成一致。特朗普总统放弃了他所说的金正日提出的糟糕协议。

2019年4月,金正恩前往俄国,首次会晤了俄国总统普京。

美国的智库国家利益中心朝鲜半岛研究主任哈里·卡齐尼斯表示,华盛顿和北京的紧张关系对特朗普与朝鲜无核化对话并不是好兆头。

卡齐尼斯认为,朝鲜90%的贸易对象都是中国。中国完全可以用朝鲜作为对付美国的一个杠杆。

他表示,朝鲜做出让步时,美国也应该相应做出让步。朝鲜半岛无核化应该逐步实现。

在韩国总统文在寅等多方人物的外交努力下,特朗普和金正恩终于在2018年实现了首次美朝峰会,缓和了因为朝核和导弹问题引发的朝鲜半岛危机。

韩国一些学者也指出,朝鲜寻求的不仅是缓解联合国经济制裁,同时需要的是安全保障。

目前,美韩双方也都没有指责朝鲜发射短程导弹和飞行物为违法联合国对朝鲜制裁禁令。

对美国来说,伊朗违反国际核协议重启核燃料生产的问题更为迫切。一些分析人士指出,2019年朝鲜发射导弹正值美国伊朗陷入对立之时。

但在美朝对话限于僵局的形势下,朝鲜半岛局势的缓和,将能持续多久?

Monday, May 6, 2019

ओसामा बिन लादेनः अल क़ायदा अब कितना ताक़तवर रह गया है?

पाकिस्तान के एबटाबाद में अमरीकी सैन्य बलों के हाथों अल-क़ायदा के सरग़ना ओसामा बिन लादेन की मौत को अब आठ साल हो चुके हैं.

ओसामा बिन लादेन जिस चरमपंथी संगठन की रहनुमाई कर रहे थे, उसे दुनिया के सबसे ख़तरनाक़ जिहादी गुटों में गिना जाता था.

इस गुट के झंडे तले कई लड़ाके लड़ा करते थे और ये भी माना जाता था कि अल-क़ायदा के पास बड़े पैमाने पर आर्थिक संसाधन हैं.

लेकिन ओसामा बिन लादेन की मौत और ख़ुद को 'इस्लामिक स्टेट' कहने वाले चरमपंथी संगठन के उभार के साथ ही अल-क़ायदा की ताक़त और रसूख़ में भारी कमी आई.

ऐसे में ये सवाल उठता है कि आज अल-क़ायदा की क्या हैसियत रह गई है और दुनिया की सुरक्षा को अब इससे किस हद तक ख़तरा है?

हाल के सालों में जब चरमपंथी संगठन 'इस्लामिक स्टेट' दुनिया भर के अख़बारों की सुर्खियां बन रहा था तो उसी दरमियां अल-क़ायदा ने दूसरी रणनीति अपनाई.

अल-क़ायदा ने बिना ज़्यादा शोर-शराबा किए संगठन को फिर से मज़बूत करने का काम शुरू किया और क्षेत्रीय गुटों के साथ रिश्ते बनाए.

'यूएस नेशनल इंटेलीजेंस' ने अपनी ताज़ा रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि अल-क़ायदा के बड़े नेता संगठन की तरफ़ से फ़रमान जारी करने की व्यवस्था को मज़बूत कर रहे हैं.

चेतावनी में ये भी कहा गया है कि "अल-क़ायदा पश्चिमी देशों और अमरीका के ख़िलाफ़ हमलों को बढ़ावा देना जारी रखे हुए है."

वैश्विक आंतकवाद के ख़तरे पर साल की शुरुआत में आई संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में कहा गया है, "अल-क़ायदा की महत्वाकांक्षाएं बढ़ती हुई मालूम पड़ रही हैं...."

"ज़रूरत के मुताबिक़ ख़ुद को ढालने की इसकी क़ाबिलियत बनी हुई है. कई इलाक़ों में ये सक्रिय है. दुनिया के फलक पर फिर से खड़ा होने की इसकी तमन्ना बरक़रार है."

इसी साल फ़रवरी में ब्रिटेन के ख़ुफ़िया प्रमुख एलेक्स यंग ने भी अल-क़ायदा के फिर से उभार को लेकर चेताया था.

ड्रोन हमलों की अमरीकी मुहिम, इसके नेताओं की हत्या और इस्लामिक स्टेट के सामने मौजूद चुनौतियां, ये वो वजहें थीं जिनकी वजह से अल-क़ायदा ने नई रणनीति अपनाई.

उसने बड़ी कामयाबी से अफ्रीका, मध्य पूर्व और दक्षिण एशिया में अपने यूनिट्स या साझीदार संगठनों का नेटवर्क स्थापित किया.

अल-क़ायदा के ये साझीदार संगठन स्थानीय चरमपंथी गुट हैं जिन्होंने अल-क़ायदा के नेतृत्व के प्रति वफ़ादारी की क़सम खाई है.

इस्लामिक स्टेट के उलट अल-क़ायदा ने बड़ी एहतियात से स्थानीय आबादी से ख़ुद को अलग रखा है.

उसकी रणनीति स्थानीय चरमपंथी गुटों के साथ गठबंधन बनाकर साथ काम करने की है.

साल 2013 में अल-क़ायदा ने अपने संगठन में 'सुधार' के इरादे से 'जिहाद के लिए एक गाइडलाइन' जारी की थी.

इस दस्तावेज़ में अल-क़ायदा ने अपने चरमपंथियों को संयम के साथ और सामाजिक बर्ताव अपनाने की नसीहत दी थी.

उन्हें ऐसा व्यवहार करने से परहेज़ करने के लिए कहा गया जिससे स्थानीय लोग विरोध करें या फिर विद्रोह को हवा मिले.

एलीज़ाबेथ केंडल ऑक्सफर्ड के पेमब्रोक कॉलेज में सीनियर फ़ेलो हैं.

वे कहती हैं, "अल-क़ायदा ने भ्रष्टाचार और समाज के एक तबक़े को हाशिये पर रखे जाने जैसी स्थानीय चिंताओं को तवज्जो देनी शुरू कर दी है और वे इसे जिहाद के ग्लोबल एजेंडे में जगह दे रहे हैं."

वो कहती हैं, "ऐसा करके वो स्थानीय लोगों के बीच 'मसीहा' की तरह काम कर रहे हैं. इस्लामिक स्टेट के निर्दयी लड़ाकों के उलट वे ख़ुद को 'जेंटलमेन जिहादी' के तौर पर पेश कर रहे हैं."

अपनी शाखाओं और साझीदार चरमपंथी संगठनों के नेटवर्क के बूते अल-क़ायदा धीरे-धीरे अपने हमले बढ़ा रहा है.

'द आर्म्ड कॉन्फ़्लिक्ट लोकेशन एंड इवेंट डेटा प्रोजेक्ट' (ACLED) के आंकड़ें बताते हैं कि साल 2018 में अल-क़ायदा ने दुनिया भर में 316 हमलों को अंजाम दिया.

अल-क़ायदा की शाखाएं

अल-क़ायदा इन द इस्लामिक मग़रिब (AQIM): ये संगठन साल 2006 में उस वक़्त अस्तित्व में आया जब एक अल्जीरियाई चरमपंथी संगठन ने अल-क़ायदा से हाथ मिला लिया.

अरब प्रायद्वीप में अल-क़ायदा (AQAP): साल 2009 में एक अंतरराष्ट्रीय जिहादी नेटवर्क के यमन और सऊदी अरब में सक्रिय शाखाओं के विलय के बाद ये संगठन वजूद में आया.

भारतीय उपमहाद्वीप में अल-क़ायदा (AQIS)अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, बर्मा और बांग्लादेश में सक्रिय है. इसकी शुरुआत सितंबर, 2014 में हुई थी.

जमात नुसरत अल-इस्लाम वल-मुस्लिमीन अल-क़ायदा से जुड़ा एक संगठन है. माली और पश्चिमी अफ्रीका में कई चरमपंथी संगठनों के विलय के बाद ये अस्तित्व में आया था.

अल-शबाब सोमालिया और पूर्वी अफ्रीका में सक्रिय है. अल-क़ायदा से इसके रिश्ते की शुरुआत साल 2012 में हुई थी.

हयात तहरीर अल-शाम (एचटीएस) सीरिया के कई चरमपंथी जिहादी गुटों के विलय के बाद वजूद में आया. संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक़ इसके तार अल-क़ायदा से जुड़े हुए हैं. हयात तहरीर अल-शाम के पास फ़िलहाल उत्तरी सीरिया के इदलिब सूबे का कंट्रोल है.